‘काशी के कोतवाल’ Kal Bhairav की कहानी: आखिर क्यों हुआ Brahma का शिरच्छेद?
नई दिल्ली। हिंदू धर्मानुसार, हर महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि भगवान शिव (Lord Shiva) के काल भैरव (Kaal Bhairav) को समर्पित होती है। इसे कालाष्टमी (Kalashtami) कहा जाता है और इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। माना जाता है कि काल भैरव की उपासना से ग्रह दोष दूर होते हैं, शत्रु और बाधाओं से सुरक्षा मिलती है, कार्य सफल होते हैं और भय समाप्त होता है।
काल भैरव ने ब्रह्मा का सिर क्यों काटा?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु के बीच यह विवाद हुआ कि सृष्टि में सर्वोपरि कौन है। ब्रह्मा जी ने सृजनकर्ता होने के नाते अपना श्रेष्ठता का दावा किया, जबकि विष्णु जी ने पालनकर्ता होने के कारण अपनी श्रेष्ठता जताई। इस विवाद को सुलझाने के लिए महादेव विशाल और अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने शर्त रखी कि जो देवता ज्योतिर्लिंग के छोर का पता लगाएगा, वही श्रेष्ठ होगा। विष्णु जी वराह रूप धरकर पाताल की ओर गए, जबकि ब्रह्मा जी हंस बनकर आकाश में उड़ गए।
ब्रह्मा जी का झूठ और काल भैरव का प्रकट होना
कई वर्षों की खोज के बाद भी विष्णु जी को अंत नहीं मिला और उन्होंने हार स्वीकार की। लेकिन ब्रह्मा जी ने झूठ बोला कि उन्हें ऊपरी सिरा मिल गया है और महादेव के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। इससे महादेव क्रोधित हुए और उनके क्रोध से एक भयंकर रूप प्रकट हुआ जिसे काल भैरव कहा गया। काल भैरव ने पल भर में ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया।
काशी के कोतवाल के रूप में काल भैरव
ब्राह्मण हत्या का पाप होने के कारण काल भैरव को तीनों लोकों में भटकना पड़ा। अंततः जब वे काशी पहुंचे, तो कटे हुए सिर का भार उनके हाथ से गिर गया। तब से वे काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं।
इस महीने की कालाष्टमी
दृक पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण अष्टमी तिथि इस वर्ष 9 अप्रैल की रात 9:19 बजे से शुरू होगी और 10 अप्रैल की रात 11:15 बजे समाप्त होगी। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करके काल भैरव की कृपा प्राप्त करने की मान्यता है।
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